दास्तान-ए- बाबूजी
प्रमोद द्विवेदी बाबूजी गजब के किस्सागो थे। उनके किस्सों में दुनिया के निराले रंग होते थे। हम सब कहते थे, ‘आप मुंशी प्रेमचंद से कम थोड़ो हो…।’ तो वे कहते थे- ‘हां यार सही में, पर बतकही के प्रेमचंद…हमें ना लिखना आया। बुलवा लो, बस…।’ दरअसल यह उनका कुदरती और खानदानी गुण था। उनके पिता…