दास्तान-ए- बाबूजी

प्रमोद द्विवेदी बाबूजी गजब के किस्सागो थे। उनके किस्सों में दुनिया के निराले रंग होते थे। हम सब कहते थे, ‘आप मुंशी प्रेमचंद से कम थोड़ो हो…।’ तो वे कहते थे- ‘हां यार सही में, पर बतकही के प्रेमचंद…हमें ना लिखना आया। बुलवा लो, बस…।’  दरअसल यह उनका कुदरती और खानदानी गुण था। उनके पिता…

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मैं, रेजा और 25 जून

चित्र : अनुप्रिया  सीमा शर्मा यह उम्र ही ऐसी होती है। सब कुछ अच्छा लगता है। सुंदरता और शोख रंग तो खींचते ही हैं, पर जोहट कर है, वह और अधिक आकर्षित करता है। शायद यह चुंबकीय उम्र होती है। खींचती है औरखिंचती भी चली जाती है। मैं रोज ही उसे देखता था। लेकिन यह…

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