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हार्दिक प्लान की काट में बीजेपी का मराठा मास्टरस्ट्रोक

सुधीर एस. रावल

गुजरात की गाथा दिलचस्प हो गई है । वजह है बीजेपी का चला नया सियासी दांव । बीजेपी आलाकमान ने एक गैर-गुजराती सी.आर. पाटिल को गुजरात पार्टी अध्यक्ष के नाते कमान सौंपी है । कांग्रेस गुजरात में फायरब्रान्ड युवा नेता हार्दिक पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने को अपना मास्टर स्ट्रोक समझ रही थी लेकिन बीजेपी ने मराठा पाटिल को आगे ला कर नहले पर दहला चला है । ये दोनो नई नियुक्तियां ऐसे वक्त में हुई है जब गुजरात में आठ विधानसभा सीटों के अहम उपचुनाव होने है । ये उपचुनाव हाल में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस में दलबदल होने की वजह से कराने पड रहे है । गुजरात में स्थानीय निकाय और जिला पंचायतों के महत्वपूर्ण चुनाव भी नवम्बर-दिसम्बर में होने है ।

इनके तहत पहले अहमदाबाद्, सूरत, राजकोट, वडोदरा, जामनगर और भावनगर जैसे अहम नगर निगमों के चुनाव होने है । इसके बाद 33 जिला पंचायतो के होने है । बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही इन चुनावों मे जीत के लिए रणनीति बनाने में लगी है । हार्दिक पटेल की नियुक्ति से कांग्रेस ने पाटीदारो और अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी), समाज के इन दोनो वर्गो को लुभाने के लिए संतुलन साधने की कोशिश की है । युवा तुर्क हार्दिक पटेल न सिर्फ धुआंदार भाषण देने की कला जानते है, बल्कि उन्हे युवा वर्ग, किसानो और छोटे कारोबारियों से जुडे मुद्दो की गुजरात में सभी वर्गो और जातियों में गूंज सुनी जा सकती है । यही वजह है कि बीजेपी ने हार्दिक पटेल की नयुक्ति पर मौन रहना ही बेहतर समझा ।

हां, जवाबी काट में बीजेपी ने अपने सियासी तरकश से पाटिल का तीर निकाला है । पाटिल की पहचान साइलेन्ट परफोर्मर होने के साथ ट्रबल-शूटर की है । इसके साथ फंड जुटाने में भी उन्हे दक्षता हासिल है । खास तौर पर दक्षिण गुजरात की समृध्द बेल्ट से । लेकिन फंड जुटाने की गतिविधियों को लेकर उन्हे सतर्क रुख अपनाना होगा । मुश्किल हातात से निपटले के उनके कौशल से बीजेपी के शीर्ष केन्द्रीय नेता अच्छी तरह अवगत है । बुनियादी तौर पर, बीजेपी के पास आगामी चुनावों मे बढत बनाए रखने के लिए दो रास्ते है ।

एक – अपने संगठन को मजबूत करना । दूसरा विपक्षी खेमे यानि कांग्रेस को कमजोर करना। बीजेपी के खिलाफ जाने वाला फैक्टर सत्ता विरोधी रूझान (ईंक्मबेंसी) हो सकता है । दो दशको से भी ज्यादा समय से गुजरात की सत्ता बीजेपी के पास ही है । ये वास्तविकता है कि नरेन्द्र मोदी अब राज्य के रूटीन मामले से नहीं जुडे है । क्योंकि वक्त बहुत कम है, बीजेपी की पहली कोशिश रहेगी कि कांग्रेस को जितना मुमकिन है, उतना कमजोर किया जा सके । कांग्रेस ने हाल में बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो जिन जिन राज्यो में कांग्रेस सरकार है, उन्गे गिराने के लिए साम दाम दंड भेद हथकंडे अपना रही है । इनके अलावा गोवा, मणिपुर, मध्यप्रदेश औऱ अरुणाचल में भी कांग्रेस में दलबदल कराने की कोशिशे की जा रही है । गुजरात में देखा जाए तो बीजेपी को बहुमत बरकरार रखने के लिए और विधायकों की भी जरूरत नही थी, लेकिन फिर भी कई कांग्रेसजनों ने हाथ छोडकर बीजेपी का कमल थाम लिया । इससे असुरक्षा बोध के संकेत मिलतदे है ।

इन नेताओं ने कांग्रेस को छोडने का फैसला किया क्योंकि वो पार्टी के भविष्य को लेकर निश्चित नहीं थे । बीजेपी आने वाले दिनों में ऐसे कोई भी मौके आते है तो उन्हे भुनाने में कोई कसर नहीं छोडेगी । सी. आर, पाटिल की तेज नजरो और सियासी कौशल के जरिए बीजेपी को इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने में आसानी रहेली । दुसरी बात यह है कि हार्दिक पटेल की नियुक्ति के कारण, बीजेपी उम्मीद लगाए बैठी है कि कांग्रेस में ओल्ड गाड्रर्स और नए नेताओं के बीच पाँवर के लिए अंदरूनी खींचतान बढेगी ।

पाटिल, अपने सियासी जोड-तोड के कौशल के साथ, कांग्रेस के असंतुष्ट वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थको पर डोरे डाल कर बीजेपी को एडवांटेज में लाने की हर मुमकिन कोशिश कर सकते है । ये सीधे या पर्दे के पीछे से किसी भी तरह से हाथ मिलाना हो सकता है । कांग्रेस के ऐसे नेता पाटीदार, ओबीसी और अन्य समुदायों मे खासी नुमाइंदगी रखते है । ये भी तथ्य हे कि हार्दिक पटेल के हाथ में कांग्रेस की कमान रहने के बाद बीजेपी को इस युवा नेता की ब्रिगेड आक्रामक चुनाव प्रचार स्टाईल की चुनौती से निपटले के लिए भी तैयार रहना होगा । ऐसे हालात में तजुबेर्कार जैसे को तैसा वाले अंदाज में जवाब देने म् सक्षम हैं ।

आखिर में, ये भी देखना होगा कि हार्दिक पटेल को आगे कर कांग्रेस ने एक बार फिर जाति और समुदाय की राजनीति की, जिसको लेकर गुजरात के लोग अजनबी नहीं है । दुसरी ओर मुख्यमंत्री के रूप में एक जैन और प्रदेश पार्टा अध्यक्ष के तौर पर मराठा को आगे कर बीजेपी ने ये संकेत देने की कोशिस की है कि उसकी राजनीति जाति और समुदाय से ऊपर है और उसे ही मौका मिलता है, जो परफोर्मेंस और योग्यता की कसौटी पर खुद को साबित करता है ।

बहरहाल आने वाले समय में गुजरात के रण में दिलचस्प संग्राम दिखने की उम्मीद है । ये सियासी ऊंट किस तरह करवट लेता है, इसी पर 2022 गुजरात विधानसभा के नतीजे निर्भर करेंगे ।

(आज समाज, नई दिल्ली, सोमवार, 17 अगस्त 2020)

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